tag:blogger.com,1999:blog-64080912008-04-01T15:44:58.454-04:00लाईफ इन ए एचओवी लेनAtul Aroranoreply@blogger.comBlogger12125tag:blogger.com,1999:blog-6408091.post-1131470409528339172005-11-08T12:20:00.000-05:002006-09-15T13:19:50.536-04:00 Table of Contents प्रस्तावनाअध्याय ‍१: ओवर टू यूएसएअध्याय २: पहली हवाई यात्राअध्याय ३: वेलकम टु अमेरिकाअध्याय ४: गड्डी जान्दी है छलांगा मारदी! अध्याय ५: अटलाँटा के अलबेले रँगअध्याय ६: वाईल्ड-वाईल्ड वेस्ट अध्याय ७: छुट्टी के रँग, केडी गुरू के सँग!अध्याय ८: साला मैं तो साहब बन गया! अध्याय ९: जीरो मतलब शून्य!अध्याय १०: पिंक या ब्लू ! Atul Aroranoreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-6408091.post-1131469764837451662005-11-08T11:04:00.000-05:002005-11-08T12:19:17.446-05:00अध्याय १०: पिंक या ब्लूचलो भाग चले पूरब की ओर भारत से वापसी हुई तो डलास से भी रूखसत होने का समय आ चुका था। अगला कार्यक्षेत्र मिला फिलाडेल्फिया। अभी तक कुल मिलाकर अमेरिका में दक्षिणी प्रांतो में ही रहना बसना हुआ था। उत्तर पूर्व के प्रांतो को लेकर एक अज्ञात सा डर बैठा रहता था। दरअसल यह सारा डर बर्फ को लेकर महेश भाई और सत्यनारायण स्वामी सरीखे मित्रों ने पैदा किया था, जो बेबुनियाद भी नही था। सत्यनारायण अपने बर्फ पर कार Atul Aroranoreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-6408091.post-1126287393879245912005-09-09T13:29:00.000-04:002005-09-09T13:36:33.890-04:00अध्याय ९: जीरो मतलब शून्य!एकबार फिर फजीहत से बचने के लिए एनआरआई तमगा चमकाना पड़ा। हुआ कुछ यूँ कि लखनऊ फोन करना था। वर्ष २००० में मोबाईल,डब्लयूएलएल,आरआईएल और एसएमएस सरीखी तकनीकें ईजाद नही हुई थीं। पीसीओ सर्वसुलभ थे। मैं सीधे पीसीओ पहुँचा और लखनऊ का नँबर मिलाने लगा। दोतीन बार प्रयास के बाद भी नँबर नही लग रहा था। सँचालिका एक मध्यमवर्गीय घरेलू सी दिखने वाली नवयुवती थी। शायद सँचालक कही तशरीफ ले गये थे और अपनी बहन को बैठाल गये Atul Aroranoreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-6408091.post-1124894688265541202005-08-24T10:39:00.000-04:002005-08-24T10:44:48.273-04:00अध्याय ८: साला मैं तो साहब बन गया!एनआरआई होने का अहसास पूरे डेढ साल बाद भारत भ्रमण पर जाने का अवसर मिला। डलास में पहले श्रीमती जी और चारूलता पूरे तीन महीने की छुट्टी पर निकल गयीं। मुझे बाद में तीन हफ्ते के लिए जाना था। डलास से ब्रसेल्स और ज्युरिख होते हुए दिल्ली पहुँचना था। आमतौर पर यूरोप में फ्लाईट सबेरे के समय पहुँचती है और पूरा यूरोप हरियाली होने की वजह से गोल्फ के मैदान सरीखा दिखता है। भारत आते आते रात हो गयी थी। पर Atul Aroranoreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-6408091.post-1120584131397724242005-07-05T13:06:00.000-04:002005-07-05T14:13:10.936-04:00अध्याय ७: छुट्टी के रँग, केडी गुरू के सँग! !पामहैंड टर्न अमेरिका का स्वतंत्रता दिवस ४ जुलाई को मनाया जाता है। स्वतंत्रता दिवस पर याद आती है सारे जहाँ से अच्छा की स्वर लहरियाँ, रँग बिरंगी झँडिया, स्कूल में बँटने वाले बूँदी के लड्डू, टीवी पर यह गिनना कि राजीव गाँधी ने कितनी बार "हम देख रहे हैं" या "हम देखेंगे" कहा। यहाँ माजरा कुछ दूसरा दिखता है। जगह जगह स्टार और स्ट्राईप्स यानि की अमेरिकी झँडा तो दिखता है पर वह तो वैसे भी साल भर हर कहीं दिखAtul Aroranoreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-6408091.post-1118076232427804282005-06-06T12:40:00.000-04:002005-07-05T13:23:46.590-04:00अध्याय ६: वाईल्ड-वाईल्ड वेस्टमूविंग एक दिन सुबह सुबह प्रोजेक्ट मैनेजर ने कमरे में बुलाकर मेरा प्रोजेक्ट समाप्त होने की सूचना दी| सीधी सादी भाषा मे मतलब यह था कि उन्हे अब मेरी जरूरत नही थी और अगले हफ्ते से मैं बेंचप्रेस के लिए तैयार हो गया| जैसा कि पहले भी बता चुका हूँ कि तेजी से बदलती तकनीकि वाले इस कंप्यूटर क्षेत्र में प्रवेश तो आसान है पर हर दोचार महीने के बाद एक प्रोजेक्ट से दूसरे प्रोजेक्ट पर जाने का मतलब कई बार एक राज्यAtul Aroranoreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-6408091.post-1114196406426194172005-04-22T14:47:00.000-04:002005-04-22T15:09:25.336-04:00अध्याय ५: अटलाँटा के अलबेले रँगउत्तर दक्षिण समागम मेरे मित्र अनुपम जी कुछ दिन के लिए मेरे कार ड्राईविंग के द्रोणाचार्य बन गये| एक दिन उनके साथ मंदिर जाना हुआ| अमेरिका में आने के बाद पहली बार मंदिर जाने का सौभाग्य मिला| मंदिर में गणेश, शिव , हनुमान , मुरुगन, भूदेवी , तिरूपति बालाजी सब की प्रतिमा एक साथ एक हाल में देख कर सुखद आश्चर्य हुआ| मैनें अनुपम जी से, जो कि हिंदु स्वंयसेवक संघ के सक्रिय कार्यकर्ता थे , से हर्षमिश्रित Atul Aroranoreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-6408091.post-1110814420393503802005-03-13T10:24:00.000-05:002005-04-22T15:09:46.753-04:00अध्याय ४:गड्डी जान्दी है छलांगा मारदी!Oh, I am going to New Jersey दो हफ्ते बाद मेरे अभिन्न मित्र नीरज गर्ग एवं सोलंकी जी भारत से मेरी ही कंपनी में आ गये| नवीन भाई ने सप्ताहाँत पर ड्राईविंग पर हाथ साफ करने के लिए रेंटल कार ले ली | हलाँकि नवीन भाई को ड्राईविंग लाईसेंस हममें से सबसे पहले मिला, पर मिला एक धीरे से लगने वाले जोर के झटके के बाद| हम सब ड्राईविंग टेस्ट देने टेस्ट सेंटर गये| यहाँ आपके साथ एक पुलिस अफसर कार में बैठ कर एक Atul Aroranoreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-6408091.post-1102087141195263852004-12-03T10:15:00.000-05:002004-12-03T10:27:18.280-05:00अध्याय ‍१: ओवर टू यूएसएटेलिफोन काल जो भूचाल बनकर आयी अपने कैरियर के तीन साल लखनऊ कानपुर में खर्च करने के बाद एक दिन मुझे भी यह ब्रह्मज्ञान हो गया कि उत्तर प्रदेश में ईनफारमेशन टेक्नोलोजी की क्रांति शायद मेरी जवानी में आने से रही| अपनी सरकार तो बस सूचना क्रांति के नाम पर हर शहर में टेक्नोलाजी पार्क बनाकर ठोंकती रहेगी सरकारी बाबूओं के पीकदान बनने के लिए, या फिर कभी कभी साईबरठेला जैसे मदारियो के तमाशे किये जाते रहेंगे| Atul Aroranoreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-6408091.post-1102086649918572572004-12-03T10:09:00.000-05:002004-12-03T10:29:50.683-05:00प्रस्तावनाअमेरिका के कुछ महानगरों के हाईवे में सबसे बाईं तरफ की लेन एचओवी यानि कि हाई आकूपेनसी वेह्किल लेन कहलाती है| अगर आप को कुछ दूर तक हाईवे से बाहर नही निकलना , तो एचओवी लेन में आप एकसमान तेज गति से सफर कर सकते है| ईसमें निश्चित अंतराल पर प्रवेश व निकास के चिन्ह निर्धारित होते हैं| बस एक बार एचओवी लेन में प्रवेश कीजिए और फर्राटे से बिना लाल बत्ती या लेन बदलने की चिंता किए भागते जाइऐ | अमेरिका में Atul Aroranoreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-6408091.post-1102102128728691722004-12-03T08:26:00.000-05:002005-01-27T14:39:44.870-05:00अध्याय ३: वेलकम टु अमेरिकावेलकम टु अमेरिका अटलांटा एयरपोर्ट पर ईमिग्रेशन से निपटने के बाद बाहर आकर देखा कि लोगों की निगाहें अपने-अपने आगंतुको को तलाश रही हैं| कुछ टैक्सी वाले आने वाले लोगों के नाम की तख्ती लिए खडे थे| तभी मुझे अपने नये कंपनी डायरेक्टर की एक हफ्ते पहले ईमेल पर दी गई सलाह याद आई कि अपने कैब ड्राईवर से मिलने के बाद ही बैगेज क्लेम से अपना समान उठाना| दो दिन लग गये थे यह पता करने में कि टैक्सी को कैब भी कहतेAtul Aroranoreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-6408091.post-1102101767880700472004-12-03T08:16:00.000-05:002005-01-27T14:30:10.853-05:00अध्याय २: पहली हवाई यात्राफन्ने खाँ मत बनो शुभचिंतको की राय थी कि अमेरिका जाने से पहले कार चलाना सीख लेना फायदे में रहेगा| हलाँकि वहाँ कार चलाने का ढंग बिल्कुल अलग है पर कम से कम स्टीयरिंग पकड़ने का शऊर तो होना ही चाहिए| अपने परिवार मे किसी ने पिछली सात पुश्तों में भी कार नही खरीदी है, अतः एक कारड्राईविंग स्कूल में जाकर ट्रेनिंग ली| ट्रेनिंग सेंटर के अनुभव से कह सकता हूँ कि ज्यादातर रईस अपने किसी रिश्तेदार या ड्राईवर से Atul Aroranoreply@blogger.com